मुगल साम्राज्य में मथुरा को इस्लामाबाद और वृन्दावन को मोमिनाबाद के नाम से जानते थे

– पर यह दोनों नाम साधारण जनता में कभी प्रचलित नहीं हो सके और केवल मुगल शाही दफ्तरों तक ही सीमित रह गये
– लेख: लक्ष्मीनारायण तिवारी, निदेशक, ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृन्दावन
वृन्दावन, 31 अक्टूबर 2018, (VT) बात सन् 1669 ई० की है, जब मुगल बादशाह औरंगजेब ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा के प्रसिद्ध केशव देव मन्दिर को तोड़कर उस स्थान पर मसजिद बनाने का आदेश दिया। किन्तु इस के साथ ही एक आदेश और दिया, वह यह कि मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद और वृन्दावन का नाम बदल कर मोमिनाबाद कर दिया जाये और यह आदेश पूरी तरह से अमल में भी लाया गया। पर यह दोनों नाम साधारण जनता में कभी प्रचलित नहीं हो सके और केवल मुगल शाही दफ्तरों तक ही सीमित रह गये। पर फारसी दस्तावेजों में एक लम्बे समय तक मथुरा के लिए इस्लामाबाद और वृन्दावन के लिए मोमिनाबाद लिखने की परम्परा चलती रही।
18 वीं सदी के मध्य में जब मथुरा- वृन्दावन जाट शासकों के अधिकार में आये तो उन्होंने सिक्के ढ़ालने के लिए मथुरा और वृन्दावन में अपनी टकसालें स्थापित कीं। किन्तु पुरानी चली आ रही परम्परा के अनुसार सिक्के मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय के नाम पर ही जारी किये गये और सिक्कों पर भी फारसी में मथुरा टकसाल के नाम पर इस्लामाबाद और वृन्दावन टकसाल के नाम पर मोमिनाबाद ही अंकित किया जाता रहा।
इस दौर के कई महत्वपूर्ण दस्ताबेज और मथुरा-वृन्दावन की टकसालों में ढ़ले वह दुर्लभ सिक्के ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृन्दावन में संग्रहीत हैं। DKS

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