लाड़ले का श्रृंगार भी कम नहीं

लाड़ले का श्रृंगार भी कम नहीं

मथुरा (DJ)। लड्डू गोपाल यानि भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप। प्रभु की नियमित सेवा करने वालों के लिए लड्डू गोपाल की ड्रेस, उनका श्रृंगार भी उतना ही महत्व रखता है जितना उनके अपने कपड़े। चांदी कारोबार की इस नगरी में लाड़ले के कपड़ों का कारोबार कब परवान चढ़ा पता ही नहीं चला। फैशन के बदलते दौर में भगवान की बांसुरी से लेकर मुकुट तक सब कुछ नये स्टाइल का है। देश और विदेश तक पहुंच रखने वाला यह कारोबार अब दो अरब से ज्यादा का हो चला है।

अपने इस लाड़ले के साज-श्रृंगार में भक्त कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। बच्चे के जन्मदिन पर कपड़े दिलाने वाले लड्डू गोपाल के लिए भी जन्माष्टमी पर ड्रेस और श्रृंगार लेना नहीं भूलते। यह परम्परा सिर्फ ब्रज ही नहीं पूरे विश्व में है।

लड्डू गोपाल के साज-श्रृंगार में कपड़े, मुकुट, माला, बांसुरी आती है। कान्हा के कपड़े दस रुपये से लेकर ढाई-तीन हजार तक में मिलते हैं। यहां से गुजरात, महाराष्ट्र बड़े पैमाने पर ड्रेस जाती हैं। ड्रेस से भी ज्यादा कीमती है कान्हा का मुकुट। पहले यह मुकुट बनारस से बनकर आते थे। अब मथुरा में बड़ी संख्या में मुकुट बनाये जा रहे हैं। यह मुकुट मैटल, जरी, रेशम, नग, मोती के बनाये जा रहे हैं। मुकुट पांच-छह रुपये से लेकर सामान्य तौर पर पांच-छह सौ रुपये तक मिलते हैं। इससे महंगे सोने और कीमती नगों के मुकुट आन डिमांड तैयार कराये जाते हैं।

कान्हा की माला सादा मोती से लेकर कीमती नगों तक की तैयार होती हैं। मालाएं दो-तीन रुपये से सौ-दो सौ रुपये की बाजार में उपलब्ध हैं। इसके अलावा बांसुरी भी दस रुपये से लेकर दो-ढाई सौ रुपये तक की आती हैं। श्रृंगार का यह सामान अब कुटीर उद्योग के रूप में मथुरा में ही तैयार हो रहा है। इस कारोबार से पांच हजार से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं। सैकड़ों छोटे-बड़े कारखाने काम कर रहे हैं। इन कारखानों से डेढ़ दर्जन बड़े व्यापारी देश के विभिन्न हिस्सों और कनाडा आदि देशों को निर्यात करते हैं। कारोबार में अगर हिस्से की बात करें तो वस्त्र और और मुकुट का बराबर का हिस्सा है। लगभग हर साल एक अरब से ज्यादा के वस्त्र और एक अरब के ही मुकुट बिक जाते हैं। इसमें स्थानीय बाजार का हिस्सा 25 फीसदी से भी कम है।

लड्डू गोपाल: करोड़ों के कारोबार की संभावना

मथुरा (DJ)। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप यानी लड्डू गोपाल का कारोबार इस बार एक करोड़ रुपये से अधिक का होने की उम्मीद है। इस बार लड्डू गोपाल पीतल के साथ-साथ जस्ता और एल्मुनियम में भी बाजार में उतारे गए हैं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर कान्हा के बाल रूप का विशेष महत्व है। ब्रजमंडल में कान्हा के बाल रूपी लड्डू गोपाल की खरीद श्रद्धालु बड़ी संख्या में करते हैं। मथुरा जनपद में लड्डू गोपाल का कारोबार बड़े पैमाने पर है। लेकिन लड्डू गोपाल बनाने के कारखाने कम हैं। इस पर पड़ोसी जनपद अलीगढ़ से तैयार होकर बिक्री को आते हैं।

जनपद में लड्डू गोपाल की बिक्री को मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव, बल्देव, गोकुल और महावन में करीब 20 दर्जन दुकानें हैं। सूत्र बताते हैं कि बाजार में इस बार पीतल के अलावा काला जस्ता व ऐल्मुनियम के लड्डू गोपाल बाजार में उपलब्ध हैं।

लड्डू गोपाल व्यवसायी बसंत कुमार मिश्रा का कहना है कि मथुरा में द्वारिकाधीश और श्रीकृष्ण जन्म स्थान के समीप एवं वृंदावन में लड्डू गोपाल की मांग अधिक है। बाजार में 50 ग्राम से लेकर पांच किलोग्राम तक वजनी लड्डू गोपाल उपलब्ध हैं। प्रत्येक दुकान पर 400 किलोग्राम से लेकर एक हजार किलोग्राम तक माल उपलब्ध है।

चीन पालने में मौजूद हैं लड्डू गोपाल

कोसीकलां। दूसरे त्योहारों की तरह कान्हा के जन्मदिन पर भी चीन ने भक्तों को लुभाने के लिए स्टाइलिश पालने बनाकर भेजे हैं। चाइनीज पालने काफी छोटे साइज में भी हैं। इनकी रेंज ४० रुपये से शुरू होती है। खास बात यह है कि लड्डू गोपाल की मूर्ति को अलग से नहीं खरीदना पड़ेगा। वे पालने में ही मौजूद हैं। गोल्ड प्लेटेड मेटल के चाइनीज पालने पहली बार आए हैं। इसके साथ ही चीन निर्मित राधाकृष्ण, माखनचोर की आकर्षक मूर्तियां दुकानों पर पर सजी हैं। इनमें स्टोन का सुंदर वर्क किया गया है।

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