हर सम्प्रदाय ने ब्रज में कार्तिक मास को बनाया खास

– डॉ.राजेश शर्मा, वृन्दावन
वृन्दावन, 17 नवम्बर 2018, (VT) कार्तिक माह का विशेष देखना है तो ब्रज-वृन्दावन की उस पवित्र भूमि का संस्पर्श जरूरी है, जहाँ श्रीकृष्ण ने बाल सुलभ लीलायें की। प्रभु के अपने घर में उनकी पावन लीलाओं से साक्षात्कार कराने वाली भाव धारा आज भी उसी सजीवता से प्रवाहित है जिसमें जीवत्व का भाव स्वयं उन्हीं की कृपा से जागृत हुआ। भौतिक जगत भले ही इसे पर्यटन की दृष्टि से देखे पर साधक और श्रद्धावान सुधीजन ब्रज-वृन्दावन में इस धारा की अनुभूति कर आज भी द्वापर के उस दौर कौ यहाँ ठहरा पाते हैं।
वास्तव में ब्रज को देखने और अनुभव करने की सद् दृष्टि भी बिना स्यामा-स्याम की कृपा के सम्भव नहीं। कार्तिक के महीने में प्रभु का कृपा-प्रसाद यहाँ उत्सवों की सतत् श्रृंखला के रूप में दृष्टिगोचर होता है। पूरे भारत के विभिन्न अंचलों से ही नहीं, अपितु विदेशों से भी कृष्ण प्रेमी सुधीजन यहाँ की पवित्र रज का स्पर्श पाने को लालायित हो उठते हैं। ब्रज परिक्रमायें होती हैं, नियम सेवा के साथ पूरे माह हर रोज ब्रज-वृन्दावन की कुंज गलियों में विभिन्न अंचल के लोगों द्वारा सामूहिक कीर्तन से उपजी स्वर लहरियाँ इस आनन्द को कई गुना बढ़ा देती हैं।

– हर अंचल के विशेष ने बनाया ब्रज के कार्तिक को खास
कार्तिक महात्म्य सनातनी संस्कृति का अपना वैशिष्ट्य है। जिसके आयोजन का विस्तार भारत के विभिन्न अंचलों में, अपनी-अपनी तरह से है। पर ब्रज-वृन्दावन के कार्तिक में सभी प्रान्तों के ‘खास’ की सहभागिता ने इसे खास बनाया है। यहाँ माह पर्यन्त निवास करने का संकल्प लेकर आने वाले
सुधीजन प्रतिदिन यमुना स्नान, मंदिर दर्शन, परिक्रमा, सोहनी सेवा, कीर्तन और भू-शयन का संकल्प लेते हैं। ब्रज में इस अस्थायी निवास के दौरान बुंदेलखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मणिपुर एवं आसाम आदि के श्रद्धालु अपनी पारम्परिक रीति से प्रतिदिन स्नानोपरान्त पूजन-अर्चन करते हुए नियम सेवा को चक्रित क्रम में पूर्ण करते हैं। यहाँ के मंदिर-धर्मशाला एवं आश्रमों में इस दौरान उड़ीसा के श्रद्धालुओं द्वारा प्रातःकाल बनाये जाने वाले श्रीकृष्ण एवं जगन्नाथ जी तथा विभिन्न प्रकार मांगलिक भू-चित्रण बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
वहीं छत्तीसगढ़ से आने वाले वन-वासी मौनियाओं के समूह भी यहाँ आकर लाठियों के साथ पारम्परिक लोकनृत्य करते हुए अपनी शैली में जब कृष्ण-कथा का गायन करते हैं तो यह दृश्य देखने लायक होता है। इस समाज के एक वृद्धजन ने बताया कि श्रीकृष्ण हमारे पूर्वज थे और हम प्रतिवर्ष कार्तिक के महीने में उन्हें श्रद्धा अर्पित करने यहाँ आते हैं। इस दौरान ये लोग उन मोर पंखों को भी यहाँ यमुना में विसर्जन और दान करते हैं जिन्हें इनके द्वारा वनों में पशु चराते हुए एकत्र किया जाता है।
वि.सं. 1885 के दौरान वृन्दावन के तत्कालीन सुकवि गोपाल राय के द्वारा रचित ‘दम्पति वाक्य विलास’ की एक पाण्डुलिपि प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में सुलभ है जिसमें उन्होंने ब्रज के कार्तिक माह का सजीव रेखांकन स्व कलम से किया है, जो इस महा-उत्सव के तत्कालीन उत्स का भी परिचायक है-
प्रात समें उठि नीकें न्हाति नर नारि राई,
दामोदर पूजति बजाय सुर बीना के।
करति चरित्र नारि चित्रनी विचित्र घर,
घरन चरित्र चित्र चित्रन के मीना के।…
राधाकुंड न्हांन दीपदांन गिरराज बड़ी, लहुरी दिवारी चैपरि खैलैं निसि कुहू कौं।
अन्नकूट गोरधन जमद्वतिया सनांन, भैयाद्वौज गोकुल प्रदक्षिना दैउ हूँ कौं।
गउ गोपआठै अखैनौमी की परिक्रमां,
दै लीजै हरिलीलनि कौ सुख छाड़ि महु कौं।
देवन जगाय पच भीषम आन्हाइ नहिं, जाइयै गुपाल कंत कातिग में कहूँ कौं।।
वास्तव में ब्रज के कार्तिक माह ने भारत के लोक पटल को पीढ़ियों से अपनी ओर आकर्षित किया है। इस पवित्र माह में राधाकुण्ड स्नान, दीपावली पर गिरिराज जी का दीपदान, अन्नकूट, यम द्वितीया स्नान, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी और देवोत्थान एकादशी आदि मनोरथों श्रृंखला पर उमड़ने वाला जन सैलाब आज भी इस यश गाथा का साक्षी है।

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